Ishavasyopanishad ईशावास्योपनिषद्
उपनिषद् – जो ईश की पावन गाथा गाते है।
उपनिषद् – जो हमें गुरु की शरण मे ले जातें है॥
उपनिषद् है नाम उनका , जो हृदय-तम मिटाते है।
आज उस परम रहस्य को, नये अंदाज में सुनाते है॥ 1
ईशावास्यं इदं सर्वम्- वो सम्पूर्ण जगति में समाया है।
सर्व प्रथम नमस्कार उसी को, जिसने संसार रचाया है।
अपनी अनुपम माया से, जिसने विश्वरूप सजाया है।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा से, विश्व ने उसको ध्याया है॥2
पाकर धरा के वैभव, पर-धन का न तुम लोभ करो।
सौ वर्षों तक कर्म करते हुए, जीवन में अपने योग धरो।
नान्यपन्था विद्यतेऽयनाय, जो कर्तव्यपथ अमर बनाता हो।
समस्त बन्धनों को काट कर, परमानन्द तक पहुँचाता हो। 3
असूर्या नाम ते लोका, जो तमस् से है ढके हुए।
न कर्म ज्ञान का बोध उन्हें, जो जीते जी है मरे हुए।
ऐसे अंधकारमय लोकों में, वे ही मर कर जाते है।
जो आत्मा को त्याग कर, वासना में जीवन गवांते है॥ 4
अनेजदेकं मनसो जवीयो, ये मन अतिवेग वाला है।
बन्ध-मोक्ष अवस्थाओं को, यही पहुंचाने वाला है॥
सब इन्द्रियों में मन की ही, शक्ति अपार बतलाई है।
जो ठहर गया निज कर्म में, उसी ने दिव्य ज्योति पाई है॥5
तदेजति तन्नैजति, सबमें वहीं ईश्वर समाया है।
तदु सर्वस्यास्य बाह्यत, सबने उसी में आश्रय पाया है।
जो सब प्राणियों में , उस दिव्यता को देख पाता है।
सर्वव्यापक परमात्मा, उसी से तो प्रेम का नाता है॥6
जब प्रेम की लगन में, श्रद्धा उतर आती है।
तब सब प्राणियों में, उसकी छवि नजर आती है।
ततो न विजुगुप्सते, फिर कौन पराया है जग में।
सर्वभूतेषु चात्मानम्, बहता वही है रग- रग में ॥7
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि, जिसने उसे अन्तस् में मान लिया।
तत्र कः मोहः कः शोकः, फिर उसने स्वयं का संधान किया।
सबमें पाया है उसी का नूर, गुरुर अपने का है त्याग किया।
प्रेम से भर निज जीवन को, सर्वस्व का है फिर याग किया॥8
याग के फल में पाया उसको, जो अकायं ,शुद्ध स्वरूप है।
कविः मनीषी परिभूः स्वयंभूः, वही पवित्र,अनादि, सतरूप है।
जग का रचनहार वहीं, वहीं सब भूपों का भी भूप है।
प्रजाओं का पालनहार वही, वही परमानन्द की धूप है॥9
विद्या- अविद्या की माया देखो, सबको ये भरमाती है।
अविद्या से जग की थाथी, जो अहं को बढाती है।
विद्या, अविद्या से भयंकर, जो गहन अँधकार ले जाती है।
विद्या अविद्या की बातें ऐसी, जिसमें बुद्धि चकराती है॥10
जिसने दोनों को समझा मानो, पाया उसी ने पार है।
विद्या अविद्या मे ही तो, बसा हुआ सारा संसार है।
अविद्या जीवन को है तारती, जो प्रकृति का सार है।
विद्वान विद्या को पाकर, सदा करते आत्म-शृंगार है॥11
सम्भूतिं च विनाशं च, सम्भूति संगठन का भाव है जानो।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा, असम्भूति जीवन की नाव है मानो।
सम्यक् दर्शन से मानव, पाता चेतना का प्रकाश है।
व्यक्तिवाद से मानव का, होता ऐश्वर्य विकास है॥ 12
हिरण्यमय पात्र से, सत्य-मुख को है छिपाया गया।
ऐश्वर्यों की चमक से, मानव को है भरमाया गया।
तत्त्वं पूषन्न् अपावृणु, हे! तेजोमय मुझे मार्ग दिखा दो ।
सत्यधर्माय दृष्टये, मुझे तुम मुझसे ही मिला दो ॥13
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य, चहुँ ओर तेरा ही प्रकाश पाया है।
जगति के कण- कण से, विश्वरूप में तू ही जगमगाया है।
तेजो यत्ते रूपं, तुम्हारे दिव्य तेज ने मेरा मन हर्षाया है।
पश्यामि… पुरुषः सोऽहं, मैंने निज स्वरूप को पाया है॥14
वायुः अनिलं अमृतं, मै गतिमान चेतन आत्मा हूँ।
इदं भस्मान्तं शरीरं, नश्वर शरीर में जीवात्मा हूँ।
भोग साधन ये देह मेरी, जो कर्मों की निशानी है।
ॐ क्रतो स्मर के उद्घोष से, पूर्ण होती जीवन-कहानी है॥15
अग्ने नय सुपथा राये, ईश्वरीय मार्ग ज्ञान- ज्योति वाला है।
जिस पथ से ज्ञानियों को, मिलता मधु-रस का प्याला है।
पाप राशि प्रथक् होती, जीवन दिव्यता से भर जाता है।
बन्धन सब कट जाते, चैतन्य आनन्द सुधा को पाता है॥16
| Dr. Sandeep Acharya Assistant Professor Department of Veda Gurukula Kangri Vishwavidyalaya Haridwar, Uttrakhand |
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