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प्रस्तावना
प्राचीन भारत की शासनपद्धति और राजनीतिक विचारों का प्रतिपादन करते हुए जिस दृष्टिकोण को इस ग्रन्थ में मैंने अपने सम्मुख रखा है, उसका उल्लेख करना उपयोगी है-
(१) प्राचीन काल में भारत राजनीतिक दृष्टि से एक देश नहीं था। धर्म, संस्कृति आदि की एकता यहाँ अवश्य विद्यमान थी, पर राजनीतिक रूप से यह देश बहुत-से छोटे-बड़े राज्यों में विभक्त था, जिनमें अनेकविध शासन-संस्थाओं की सत्ता थी। वैदिक युग के आर्य अनेक ‘जनों’ (कबीलों) में संगठित थे। शुरू में ये जन ‘अन-वस्थित’ दशा में थे। जब ये स्थायी रूप से किसी प्रदेश में बस गए, तो ग्रामों और जनपदों का निर्माण हुआ। इन जनपदों का स्वरूप प्रायः वैसा ही था, जैसा कि प्राचीन ग्रीस के ‘पोलिस’ का और प्राचीन इटली के ‘सिवितास’ का था।
ऐतिहासिकों ने इन्हें ‘नगर-राज्य’ (सिटी स्टेट) की संज्ञा दी हैं। भारत के प्राचीन जनपद भी नगर-राज्यों के रूप में ही थे, और उनका स्वरूप आधुनिक युग के राज्यों से बहुत भिन्न था। उनकी शासनसंस्थाएँ भी वर्तमान समय की शासनसंस्थाओं से भिन्न प्रकार की थीं। कतिपय जनपदों में गणशासन की सत्ता थी, और कतिपय में वंशक्रमानुगत राजाओं के शासन की। गणराज्यों में भी कुछ में श्रेणितन्त्र या कुलतन्त्र शासन विद्यमान थे, और कुछ में लोकतन्त्र शासन की सत्ता थी। सब राज्यतन्त्र जनपदों की शासन-संस्थाएँ भी एक-सदृश नहीं थीं।
उनमें भी वैराज्य, वैराज्य, भोज्य, राज्य, एकराज्य आदि अनेकविध शासन थे । कतिपय जनपदों में प्रजा (विशः) द्वारा राजा के वरण किये जाने की प्रथा थी, और कुछ में राजा स्वेच्छाचारी रूप से शासन किया करते थे। यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि इन जनपदों में सदा एक-सी ही शासन पद्धति कायम नहीं रही। अनेक ऐसे जनपदों में, जिनमें पहले गणशासन था, बाद में राजतन्त्र शासन स्थापित हो गया; और अनेक राजतन्त्र जनपदों में बाद में गणतन्त्र शासन की स्थापना हो गई। इस दृष्टि से भारत का प्राचीन इतिहास प्राचीन ग्रीस के इतिहास के समान है।
भारत की प्राचीन शासन-संस्थाओं का अध्ययन करते हुए इन तथ्यों को अवश्य दृष्टि में रखना चाहिए । प्राचीन जनपदों का स्वरूप और उनकी शासन-संस्थाएँ आधुनिक युग से बहुत भिन्न थीं। इस तथ्य की उपेक्षा करने के कारण ही श्री काशीप्रसाद जायसवाल ने पौर-जानपद के स्वरूप को इस ढंग से प्रतिपादित कर दिया है, मानो वह वर्तमान ब्रिटिश पालियामेंट के सदृश हो । प्राचीन भारत में पौर-जानपद नामक संस्थाओं की सत्ता अवश्य थी। पर वे राज्य की केन्द्रीय संसद् न होकर पुर-संघ (पुरसभा) और जनपद-संघ (जनपद संभा) की ही स्थिति रखती थीं।
उनकी तुलना प्राचीन श्रोक नगर-राज्यों की सभाओं से अवश्य की जा सकती है, पर आधुनिक युग के सांसद प्रणाली वाले राज्यों का पार्लियामेंट से उनके सादृश्य को प्रतिपादित कर सकना सम्भव नहीं है। प्राचीन समय में न केवल भारत में अपितु संसार के सभी देशों में राज्यसंस्था का स्वरूप आधुनिक राज्योंसे बहुत भिन्न था। इसी कारण उनकी शासन-संस्थाएँ भीभिन्न प्रकार की थीं।
इस तथ्य को दृष्टि में न रखने से प्राचीन शासन पद्धति और राजनीतिक संस्थाओं के स्वरूप का निरूपण करने में बहुत भूल हो सकती है। मैंने यत्न किया है, कि पाणिनि की अष्टाध्यायी, कौटलीय अर्थशास्त्र, वाल्मीकीय रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थों में प्राचीन जनपदों के स्वरूप और उनकी शासन-संस्थाओं के सम्बन्ध में जो भी निर्देश मिलते हैं, उनका विशदरूप से विवेचन किया जाए। ऐसा करते हुए मैंने इन ग्रन्थों से बहुत-से उद्धरण भी दे दिये हैं। ……………….
इस ग्रन्थ को लिखते हुए मैंने प्रायः उस सब सामग्री का उपयोग किया है, जो इस विषय पर प्राप्तव्य है। यह विषय अत्यन्त गहन है, अतः इस विषय के ग्रन्थों की भाषा बहुत सरल नहीं हो सकती। फिर भी मैंने यत्न किया है, कि जहाँ तक सम्भव हो, भाषा को सरल और शैली को सुबोध रखा जाए। पर अनिवार्य रूप से ग्रन्थ में अनेक ऐसे शब्दों का उपयोग हुआ है, जिन्हें अनेक पाठक कठिन समझ सकते हैं। यह आवश्यक भी है, क्योंकि दण्डनीति-सम्बन्धी प्राचीन साहित्य के अपने शब्दों को प्रयुक्त किए बिना उनके अभिप्राय को भलीभाँति स्पष्ट नहीं किया जा सकता ।
– सत्यकेतु विद्यालंकार

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