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प्रारम्भिक शब्द
समाजशास्त्र
इस पुस्तक में मैंने यह यत्न किया है, कि समाजशास्त्र के सिद्धान्तों को सरल भाषा में उपस्थित करूँ । समाजशास्त्र एक नया विज्ञान है। एक पृथक् विज्ञान के रूप में इसके अध्ययन का प्रारम्भ हुए अभी केवल एक सदी के लगभग समय हुआा है। पर इस थोड़े-से समय में ही इस विज्ञान ने बहुत महत्त्व प्राप्त कर लिया है। इसका कारण यह है, कि मनुष्य के जीवन में समाज का बहुत महत्त्व है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है जो समाज में रहता हुआ ही अपने योगक्षेम का साधन करता है, भौर उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होता है।
मनुष्यों के प्राचरण, विचार, विश्वास व व्यवहार प्रायः संमाज द्वारा ही निर्धारित होते हैं। मनुष्य जो कुछ चाहे नहीं कर सकते, क्योंकि उनपर समाज का नियन्त्रण बहुत सुदृढ़ होता है। प्रत्येक मनुष्य किसी परिवार का सदस्य होता है, किसी गाँव या नगर में अन्य लोगों के पड़ोस में रहता है, किसी जात-बिरादरी का अंग होता है, अन्य लोगों के साथ मिलकर भार्थिक उत्पादन करता है, किसी धार्मिक व सांस्कृतिक समुदाय के साथ सम्बन्ध रखता है, और किसी राज्य का नागरिक होता है। मनुष्यों के आपस में एक-दूसरे के साथ, विभिन्न समूहों व समुदायों के साथ और सम्पूर्ण समाज के साथ अनेक प्रकार के सम्बन्ध होते है।
यदि ये सम्बन्ध न्याय और औचित्य पर याश्रित हों, तो सबका हित व कल्याण होता है। अन्यथा, समाज में विच्छृङ्खलता उत्पन्न हो जाती है। बर्तमान समय में मनुष्यों के जो परस्पर सम्बन्ध हैं, उन्हें पूर्णतया समुचित व न्याय्य नहीं कहा जा सकता । इसीलिये अनेक ऐसी समस्याएँ उत्पन्न हो गई है, जिनका वैज्ञा निक रीति से अनुशीलन करना उपयोगी है। कुछ लोग धनी है, कुछ गरीव और बेकार है। कुछ शोषक हैं, अन्य शोषित है। कुछ को जन्म से ही नीच माना जाता है, भौर कुछ को ऊँचा। ऐसे लोग भी समाज में विद्यमान हैं, जिन्हें उनके कुल के कारण ही अछूत समझा जाता है।
धार्मिक समुदायों तक का स्वरूप भी इस समय ऐसा है। जिसके कारण मनुष्यों में प्रेम व सहानुभूति के बजाय विद्वेष की वृद्धि होती है। मनेक प्रकार के अपराध भी समाज में विद्यमान है। वेश्यावृत्ति, गुण्डागर्दी, लूट-मार बादि का भी अभी अन्त नहीं हुमा है। मनुष्यों के हित व कल्याण के लिये जिस सामाजिक न्याय की आवश्यकता है, अभी उसकी स्थापना नहीं हुई है। हमारा सामाजिकः संग-ठन अभी ऐसा नहीं बन सका है, जिसे न्याय्य कहा जा सके और जिस द्वारा सरका हित हो सके ।
हमारी जो सामाजिक संस्थाएँ हैं, वे किसी देवी विधान की परिणाम नहीं है। वे या तो ऐतिहासिक विकास की परिणाम हैं, घोर मा मनुष्यों ने अपने विचार व विवेक द्वारा उनका निर्माण किया है। हम अपने विवेक द्वारा उनमें ऐसे परिवर्तन कर सकते हैं, जिनसे सबका हित य कल्याण हो सके। पर इसके लिये यह प्रापश्यक है, कि हम मनुष्यों के पारस्परिक सम्बन्धों व संस्थाधों पर वैज्ञानिक रीति से विचार करें ।
जब तक मनुष्यों की मूलभूत सामाजिकता के विषय में वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया जायगा, हम ऐसे सामाजिक सम्बन्धों का प्रतिपादन नहीं कर सकेंगे, जो सबके लिये हितकर व न्याय्य हों। मनुष्य किस प्रकार के सामाजिक सम्बन्धों द्वारा एक-दूसरे के साथ सम्बद्ध हैं, इन सम्बन्धों के लिये प्रेरणा वे किन तत्त्वों द्वारा प्राप्त करते हैं, और इन सम्बन्धों के क्या प्रयोजन व लक्ष्य हैं- इन सब बातों की वैज्ञानिक ढंग से विवेचना करके ही हम समाज का एक ऐसा रूप विकसित कर सकते हैं जिसके द्वारा सबका हित सम्भव हो सके । समाजशास्त्र इसी के लिये यत्न करता है। यही कारण है, जो इस विज्ञान का महत्त्व निरन्तर बढ़ता जा रहा है।
समाजशास्त्र पर हिन्दी में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे सभी उप-योगी व महत्त्व की हैं। पर इस ग्रन्थ में मैंने इस बात का विशेष रूप से यत्न किया है, कि विषय की गम्भीरता को कायम रखते हुए उसे प्रतिपादित करने की शैली ऐसी हो, जिसे पाठक व दिद्यार्थी सुगमता के साथ समझ सकें ।
समाजशास्त्र में जिन पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उनका कोई अन्तिम व प्रामाणिक रूप अभी हिन्दी में स्वीकृत नहीं हुमा है। इसीलिये मैंने हिन्दी के पारिभाषिक शब्दों के साथ-साथ अंग्रेजी के शब्द भी दे दिये हैं, जिसके कारण पाठकों को विषय के समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी। मैंने हिन्दी के प्रायः वही पारिभाषिक शब्द प्रयुक्त किये हैं, जो इस विषय के अन्य ग्रन्थों में किये जाते हैं। पर कहीं-कहीं उनमें भेद भी है। उदाहरण के लिये मैंने एसोसियेशन (Association) के लिये समुदाय शब्द का प्रयोग किया है, ‘समिति’ का नहीं।
एसोसियेशन शब्द नागरिकशास्त्र और राजनीतिशास्त्र में भी प्रयुक्त होता है। हिन्दी के सभी लेखक वहाँ इसके लिये समुदाय शब्द का प्रयोग करते है। अतः मैंने यही उचित समझा कि एसोसियेशन का अनुवाद ‘समुदाय’ करूं, ‘समिति’ नहीं। समाजशास्त्र की अन्य हिन्दी पुस्तकों में समुदाय शब्द प्रायः कम्यूनिटी (Community) के लिये प्रयुक्त किया गया है। कम्यूनिटी के लिये मैंने इस ग्रन्थ में कम्यूनिटी शब्द ही रखा है, क्योंकि इसका कोई उपयुक्त हिन्दी शब्द मुझे समझ में नहीं आया ।
मुझे इस बात की हार्दिक प्रसन्नता है, कि मेरे इस ग्रन्य ‘समाजशास्त्र’ को पाठकों ने पसन्द किया, और अनेक विश्वविद्यालयों ने इसे पाठ्यपुस्तक के रूप में भी स्वीकार किया । नये संस्करण में मैंने इस ग्रन्थ को पाठकों व विद्यार्थियों के लिये अधिक उपयोगी बनाने का प्रयत्न किया है, और इसमें झावश्यक संशोधन व परिवर्धन कर दिये हैं।
– सत्यकेतु विद्यालंकार

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