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प्रारम्भिक शब्द
इस पुस्तक में मैंने यह प्रयत्न किया है, कि राजनीतिशास्त्र के मूलभूत सिद्धान्तों को सरल भाषा में उपस्थित करूँ। भारत के प्राचीन विचारक राजनीतिशास्त्र को बहुत महत्त्व देते थे। उनका कहना था कि “अन्य सब धर्म राजधर्म के अन्तर्गत होते हैं।” आचार्य शुक्र दण्डनीति या राजनीतिशास्त्र को हो एकमात्र विद्या मानते थे। उनकी सम्मति में अन्य सब विद्याओं की सत्ता व स्थिति दण्डनीति पर ही निर्भर करती है।
आचार्य चाणक्य के अनुसार भी अन्य विद्याओं के विकास के लिये मानव समाज में जो योगक्षेम चाहिये, वह दण्ड (व्यवस्था, शासक-शासित भाव) द्वारा ही स्थापित हो सकता है। जो विद्या इस ‘दण्ड’ का प्रतिपादन करे, उसे ही दण्डनीति या राजनीतिशास्त्र कहा जाता था। वर्तमान युग में राजनीतिशास्त्र का महत्त्व बहुत अधिक बढ़ गया है। जब तक राजशक्ति के प्रयोग का अधिकार किसी एक व्यक्ति या एक श्रेणी के हाथों में था, सर्वसाधारण जनता राजनीति में विशेष रुचि अनुभव नहीं करती थी। पर लोकतन्त्र-वाद के विकास के कारण अब स्थिति बदल गयी है।
अब जनता अपना शासन स्वयं करती है, या ऐसे प्रतिनिधियों का निर्वाचन करती है जिन्हें वह एक विशेष नीति के अनुसार शासन करने का कार्य सुपुर्द करती है। इस दशा में यह आवश्यक है, कि प्रत्येक मनुष्य राजनीतिशास्त्र का ज्ञान प्राप्त करे। राज्य क्या है? राज्य की उत्पत्ति किस प्रकार हुई ? राज्य का क्या प्रयोजन व उद्देश्य है ? राज्यसंस्था में नागरिकों की क्या स्थिति है ? नागरिकों के क्या अधिकार और कर्तव्य हैं? ये सब बातें इस प्रकार की हैं, जिनका ज्ञान प्रत्येक मनुष्य को अवश्य ही होना चाहिये। मनुष्यों के हित और कल्याण के साथ राज्य का घनिष्ठ सम्बन्ध है।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, वह समाज में रहकर ही अपनी उन्नति करता है। राज्य मनुष्यों के सामाजिक व सामुदायिक जीवन का सर्वोत्कृष्ट रूप है। राजनीतिशास्त्र ही वह विज्ञान है, जो राज्य को अपना प्रतिपाद्य विषय बनाकर उन सिद्धान्तों व उपायों का प्रतिपादन करता है, जिनसे कि मनुष्यों का सामूहिक जीवन सुव्यवस्थित, सुमर्यादित और समुन्नत हो सकता है। अतः इस विज्ञान का अनुशीलन करना न केवल विद्यार्थियों के लिये उपयोगी है, अपितु प्रत्येक नागरिक के लिये भी लाभकर व आवश्यक है।
राजनीतिशास्त्र के सिद्धान्तों और मन्तव्यों में निरन्तर परिवर्तन होते रहते हैं। अभी तक भी वह समय नहीं आया, जब कि इस शास्त्र के सिद्धान्तों को सर्वमान्य व सर्व-सम्मत कहा जा सके। मैंने यह प्रयत्न किया है, कि विभिन्न विषयों पर जो विचार प्राचीन और अर्वाचीन, व प्राच्य और पाश्चात्य विचारकों के रहे हैं, उनका इस पुस्तक में उल्लेख कर दिया जाय, और साथ ही उन सिद्धान्तों का विशद रूप से प्रतिपादन किया जाय, जिन्हें कि वर्तमान समय के विचारक मान्य समझते हैं।
राजनीतिशास्त्र पर अभी हिन्दी में बहुत कम पुस्तके हैं। पारिभाषिक शब्दों का कोई अन्तिम रूप अभी तक विद्वानों ने स्वीकृत नहीं किया है। भारत के नये संविधानों का जो हिन्दी रूप प्रकाशित हुआ है, उसमें ऐसे अनेक शब्द आ गये हैं जिनका राजनीति-शास्त्र में भी प्रयोग होता है। इन शब्दों का मेने इस ग्रन्थ में उपयोग किया है। भारत के संविधान में राजनीतिशास्त्र के जिन पारिभाषिक व विशिष्ट शब्दों का हिन्दी रूपान्तर नहीं हुआ, उनके लिये मैने यह प्रयत्न किया है, कि ऐसे शब्दों को प्रयोग करूँ जो दण्डनीति या राजधर्मविषयक प्राचीन भारतीय साहित्य में प्रयुक्त होते थे।
मैंने इस बात का विशेष रूप से प्रयत्न किया है, कि पुस्तक की भाषा सरल हो, और विषय को प्रतिपादित करने को शैली ऐसी हो जिसे पाठक व विद्यार्थी सुगमता के साथ समझ सकें। पर विषय की गम्भीरता और जटिलता के कारण कहीं-कहीं भाषा बहुत सुगम नहीं रह सकी है। ज्यों-ज्यों हिन्दी में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान-सम्बन्धी ग्रन्थों को वृद्धि होती जायगी, भाषा और प्रतिपादन-शैली भी अधिक-अधिक परिमार्जित होतो जायगी।
मुझे आशा है, कि इस पुस्तक के पाठक यह अनुभव करेंगे कि राजनीतिशास्त्र के गहन सिद्धान्तों को भी हिन्दी में सरलता के साथ लिखा जा सकता है, और हिन्दो की एक अपनी पृथक् शैली ऐसी हो सकती है, जो अंग्रेजी को छाया न होकर उससे स्वतन्त्र हो। मुझे आशा है, इस पुस्तक से पाठकों व विद्यार्थियों को सन्तोष होगा।
मुझे इस बात को हादिक प्रसन्नता है, कि ‘राजनीतिशास्त्र’ को पाठकों ने पसन्द किया, और अनेक पत्र-पत्रिकाओं ने इस ग्रन्व की विशद रूप से आलोचना कर मेरे उत्साह को बढ़ाया। नये संस्करण में मैंने इस ग्रन्थ को पाठकों व विद्याथियों के लिये अधिक उपयोगी बनाने का प्रयत्न किया है और इसमें आवश्यक संशोधन व परिवर्तन कर दिये हैं।
हिन्दी में पाठ्य-पुस्तकों की मांग निरन्तर बढ़ रही है। न केवल बो० ए० के विद्यार्थी, अपितु एम० ए० के विद्यार्थी भी अब हिन्दी की पुस्तकों द्वारा विषय को पढ़ना चाहते हैं। यह भारत में निरन्तर बढ़ती हुई राष्ट्रीय भावना का ज्वलन्त प्रमाण है। मुझे सन्तोष है कि विद्याथियों ने मेरी रचना को उपयोगी पाया, और अनेक विश्वविद्यालयों ने इसे पाठ्यक्रम में स्थान प्रदान किया। नवे संस्करण को अध्यापक व विद्याथों पहले की अपेक्षा अधिक उपयोगी पायेंगे, इसका मुझे विश्वास है।
सत्यकेतु विद्यालंकार

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