भूमिका
वेद समस्त ज्ञान-विज्ञान के आगार हैं। इसलिए मनु जी ने कहा है ‘सर्वज्ञानमयो हि सः’, ‘सर्वं वेदात् प्रसिद्धयति’। मनु के स्वर में स्वर मिलाते हुए सभी आचार्यों ने इनको (वेदों को) ज्ञान का आगार माना है। ऋषि दयानन्द ने भी मनु के स्वर में स्वर मिलाकर कहा कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। इसमें मनुष्य मात्र के लिए उपयोगी समस्त ज्ञान-विज्ञान पाए जाते हैं।
चारों आश्रमों ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्न्यास सभी का आधार गृहस्थ आश्रम ही तो है। मनु जी ने तो यहां तक कहा कि
यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् ।
तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥
(मनुस्मृति, ६/९०)
इस गृहस्थ आश्रम के प्रतिपादन के लिए ऋग्वेद के दशम मंडल के तथा अथर्ववेद के चतुर्दश कांड के प्रथम और द्वितीय सूक्त ( ‘सूर्या ‘विवाह सूक्त) में इसका विशेष महत्त्व दर्शाया गया है। अनेक भाष्यकारों ने इनकी व्याख्या एवं भाष्य लिखे, किन्तु जैसा कि पंडित भगवद्दत्त जी ने स्वामी समर्पणानन्द जी के संबंध में कहा है कि ‘धरतीतल पर वेदविषय की सूझ (पंडित बुद्धदेव विद्यालंकार) स्वामी समर्पणानन्द जी जितनी किसी की नहीं’। इस सूझ के अनुसार ही अथर्ववेद के चतुर्दश कांड के प्रथम और द्वितीय सूक्त में आए मन्त्रों की व्याख्या स्वामी जी ने की है।
मुझे यह व्याख्या हस्तलिखित रूप में उनके लिखित संग्रह में प्राप्त हुई, किन्तु वह व्याख्या प्रथम और द्वितीय सूक्त के पांचवें मंत्र तक थी। मैंने उस व्याख्या को असकृत् पढ़ा एवं आलोडन किया। मुझे यह व्याख्या अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रतीत हुई तथा वर्तमान समय में तो इसकी महत्ता एवं उपयोगिता की अत्यन्त आवश्यकता है, किन्तु वह अधूरी व्याख्या प्रकाशित न कर उसको पूर्ण करने का प्रयास मैंने किया।
इसमें प्रायः ६९ मंत्र (प्रथम सूक्त के ६४ मंत्र तथा द्वितीय सूक्त के ५ मंत्र) पूज्य स्वामी समर्पणानन्द जी द्वारा कृत हैं तथा शेष मैंने उन्हीं की शैली का अनुवरण करते हुए पूर्ण करने का प्रयास किया। जिनकी संख्या लगभग आधी है अर्थात् ६९ स्वामी जी की है तथा शेष ७० मंत्रों की व्याख्या मेरी है।
मैं इस व्याख्या को करने में कितना सफल हुआ, यह तो विद्वज्जन ही निर्णय करेंगे, किन्तु जब यह व्याख्या प्रथम संस्करण के रूप में प्रकाशित हुई तो गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के एक विद्वान् ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए लिखा कि “मैंने संपूर्ण व्याख्या एक दृष्टि में ही पढ़ ली तथा इससे बहुत आह्लादित हुआ।” मुझे भी संतोष हुआ कि यह व्याख्या उपयोगी है।
‘पावमानी’ पत्रिका में इसका प्रकाशन भी हुआ, किन्तु वह प्रायः अब सुलभ नहीं। इसलिए इसके महत्त्व को समझते हुए श्री अजय गुप्त जी ने अपने सुपुत्र विश्वा वसु गुप्त के पाणिग्रहण संस्कार के अवसर पर इसको प्रकाशित करने का विचार किया, जिसका परिणाम आपके करकमलों में है। श्री गुप्त जी की भावनाओं का आदर करते हुए आप इसे स्वयं पढ़कर जन-जन तक प्रचार करेंगे।
निवेदक:-
स्वामी विवेकानन्द सरस्वती
कुलाधिपति
गुरुकुल प्रभात आश्रम,
टीकरी, भोला-झाल,
मेरठ-२५०५०१

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