स्वामी दयानन्द का जीवन दर्शन और 200 सुवचन
Swami Dayanand ka Jivan Darshan aur 200 Suvachan

60.00

Book Details:
  • Author: Dr. Chandrashekhar Lokhande
  • Language: Hindi
  • Pages: 104
  • Edition: 2024
  • Cover: Paperback
  • ISBN: 9788197092749
  • Weight: 126 Gms.
Description

भूमिका

‘स्वामी दयानन्द जीवन दर्शन और दो सौ सुवचन’ यह पुस्तक आज के होनहार युवा वर्ग के समक्ष प्रस्तुत करते हुए मुझे प्रसन्नता हो रही है। स्वामी जी के बारे में सर्व सामान्य मत है कि उन्होंने केवल धर्म एवं आध्यात्मिकता के क्लिष्ट सिद्धान्तों को ही जनता के सामने रखा है, लेकिन यह बात पूर्ण सत्य नहीं है।

स्वामी जी ने वैदिक धर्म एवं भारतीय संस्कृति की मान्यताओं को सत्य और शास्त्र की कसौटी पर कस कर दुनिया के सामने प्रस्तुत किया है। उन्हें यह क्यों करना पड़ा? क्योंकि उनसे पूर्व हमारे धर्म और संस्कृति पर विरोधियों एवं विदेशियों द्वारा आक्रमण किये जा रहे थे। नवजागरण काल के प्रारम्भ में स्वामी जी ने ऐसी विकट विचारधारा को रोकने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

भारतवर्ष के इतिहास में उन्नीसवीं शताब्दी बहुत माने रखती है। इसी शती में अनेक समाज सुधारक भारतीय आकाश में तेजस्वी तारों के रूप में चमके हैं, जिनमें महर्षि दयानन्द रूपी ध्रुव तारा अपने प्रखर प्रकाश से सम्पूर्ण जगत् को तेजोमय कर गया। स्वामी दयानन्द सरस्वती पुनर्जागरण काल के अग्रगण्य सुधारक हैं। उन्होंने शास्त्र शुद्ध वेदभाष्य कर धर्म, संस्कृति और अध्यात्म का सच्चा स्वरूप दुनिया के सामने प्रस्तुत किया। भारतवर्ष के आकाश में फैले अन्धकार को सत्यार्थप्रकाश की प्रखर किरणों से दूर कर जगमग कर दिया।

स्वामी जी ने मानव समाज के लिए जो कार्य किया है, वह विश्व के महापुरुषों को ज्ञात है; इसमें कोई सन्देह नहीं है, लेकिन आज की पाश्चात्य प्रिय युवा पीढ़ी पुर्नजागरण काल के महापुरुषों से अनभिज्ञ है। आज का नौजवान हमारी संस्कृति और सभ्यता से बिल्कुल अनभिज्ञ है। इसके लिए हम ही उत्तरदायी हैं। नौजवानों तक इस प्रकार का साहित्य पहुँचना चाहिए। जिससे कि वे अपनी संस्कृति एवं इतिहास पर गर्व कर सकें। इस कमी को पूरा करने का कार्य लेखक ने अपनी अल्पमति और शक्ति के माध्यम से किया है। जिस देश का युवक महापुरुषों के आदर्शों पर चलने लगता है, वह देश उन्नति के शिखर पहुँचने में सफल हो जाता है।

स्वामी दयानन्द ने सिर्फ धर्म और अध्यात्म तक ही सीमित रहकर प्रचार अभियान नहीं चलाया बल्कि समाज, राष्ट्र और जीवन निर्माण का भी सन्देश जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया है। अभिभावकों, विद्यार्थियों एवं कन्याओं को सुसंस्कारित और शिक्षित करने के लिए उन्होंने अपनी वाणी और लेखनी का सदुपयोग किया।

इक्कीसवीं सदी में युवाओं को सन्मार्ग पर प्रेरित करने के लिए 200 सुवचनों को इस पुस्तक में संकलित किया गया है, जिससे कि एक बलवान और गुणवान यवा राष्ट्र का निर्माण हो सके। साथ ही स्वामी दयानन्द सरस्वती किस राष्ट्र की कल्पना करते थे और समाज को किस तरह संघठित कर बलशाली बनाना चाहते थे। इन सारी बातों को इस पुस्तक में उनके अनेक सुवचनों के माध्यम से दर्शाया गया है।

इस तरह की पुस्तक के लेखन का प्रस्ताव आर्यजगत् के प्रकाशक प्रसिद्ध विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द के श्री अजयकुमार जी आर्य ने मेरे समक्ष रखा, उन्होंने सुझाव दिया कि स्वामी दयानन्द के जन्मदिवस को दो सौ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं, अतः उनके 200 सुवचन भारतीय समाज के सामने प्रस्तुत किये जायें। मुझे भी वह बात या यूँ कहिए उनका प्रस्ताव उचित लगा और मैं भी उस कार्य में लग गया। आज वह पुस्तक आपके • हाथों में है।

मुझे इस शीघ्रतापूर्ण और चुनौती भरे कार्य में पत्नी सौ. संध्या लोखण्डे और पुत्र चि. शैलेश चन्द्र लोखण्डे का बड़ा सहयोग प्राप्त हुआ। श्री अजयकुमार जी आर्य के प्रस्ताव एवं प्रकाशन की तत्परता के लिए भी उन्हें धन्यवाद।

लेखक
प्रो० (डॉ.) चन्द्रशेखर लोखण्डे

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