भारतीय संस्कृति का इतिहास
Bhartiya Sanskriti Ka Itihas

150.00

Book Details:
  • Author: Pandit Bhagvaddutt (Research Scholar)
  • Language: Hindi
  • Pages: 224
  • Edition: 2019
  • Cover: Paperback
  • ISBN: 9788170771379
  • Weight: 254 Gms.
Description

भूमिका

भारतीय सरकार के इण्डियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (I.A.S.) ट्रेनिंग स्कूल में पाँच वर्ष तक मुझे भारतीय-संस्कृति पर व्याख्यान देने का अवसर मिला। अगले पृष्ठ उन्हीं व्याख्यानों का हिन्दी में संक्षेप हैं। चिर-काल से मुझे यह अनुभव हो रहा था कि योरोपीय लेखकों ने भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास का जो कलेवर खड़ा किया है, वह तर्क, विज्ञान और यथार्थ इतिहास की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। अतः मैंने परम्परागत सर्वस्वीकृत-काल-क्रमानुसार भारतीय इतिहास और उसके विभिन्न अङ्गों का पढ़ना आरम्भ कर दिया। गत चालीस वर्ष के अविश्रान्त-परिश्रम ने इसी मार्ग को ठीक पाया। फलतः यह इतिहास उसी मार्ग पर चलकर लिखा गया है। निश्चय ही भारतीय विद्वान् अति प्राचीन काल से अपना इतिहास लिखते और सुरक्षित करते रहे हैं। केवल मुसलमानी-शासन के दिनों में यह परम्परा कुछ उच्छिन्न हुई।

I.A.S. स्कूल में पढ़ने वाले योग्य छात्र और विशेष कर फारेन सर्विस के छात्र प्रति वर्ष यही कहते थे कि भारतीय संस्कृति विषयक-योरोपीय विचार वे अंग्रेजी पुस्तकों में थोड़ा-बहुत पढ़ चुके हैं। संसार के विभिन्न देशों के लोग दूतावासों के उनसे पूर्ववर्ती सज्जनों से प्रश्न करते रहते हैं कि इस विषय पर भारतीय-मत बताओ, अतः भारतीय पक्ष का ज्ञान उनके लिए परम आवश्यक हो गया है।

वस्तुतः भारतीय छात्रों को भारतीय-परम्परा का ज्ञान भूल-सा रहा है, अतः उसका पुनर्जीवन आवश्यक है। फिर भी योरोपीय लेखकों द्वारा कल्पित तिथियाँ और तद्विषयक उनके विचार भी मैंने यत्र-तत्र लिख दिये हैं।

इस इतिहास में भूमि-सृजन से आरम्भ करके उत्तरोत्तर-युगों के क्रम से घटनाओं का उल्लेख है। यह क्रम बनावटी नहीं, यथार्थ है। भारतीय संस्कृति इसके बिना समझ ही नहीं आ सकती। इन पृष्ठों में दी गई काल गणना आदि के प्रमाण मद्रचित वैदिक वाङ्‌मय का इतिहास, भारतवर्ष का बृहद् इतिहास तथा भाषा का इतिहास में मिलेंगे।

इस इतिहास के पहले सत्ताईस अध्यायों में जो कुछ लिखा गया है, उसका अधिकांश भाग प्राचीन लेखों का अनुवादमात्र है। मैंने अपनी ओर से लिखने का प्रयास बहुत थोड़ा किया है। अनेक स्थानों पर प्रत्येक वाक्य के लिए मूल ग्रन्थों के प्रमाण उपस्थित किये जा सकते हैं। पर ग्रन्थ के अधिक विस्तृत होने के भय से ऐसा किया नहीं गया। अर्वाचीन कालों और विचार धाराओं का इतिहास भी सप्रमाण ही है।

कला-विषयक सत्ताईसवें अध्याय : में पूर्व-लिखित कुछ बातें स्वल्प विस्तार से दोहराई गई हैं, ऐसा करना आवश्यक था। अति विस्तृत विषय को यहाँ थोड़े स्थान में ही लिपिबद्ध किया गया है। अतः यह पुस्तक वैदिक भारतीय संस्कृति का दिग्दर्शन-मात्र है। इसे पढ़कर साधारण छात्र और विद्वान् दोनों लाभ उठा सकेंगे।

मैं श्री बापट जी प्रिंसिपल और श्री जे.डी. शुक्ल जी I.C.S. उपप्रिंसिपल का हार्दिक धन्यवाद करता हूँ, जिनकी कृपा से मैं I.A.S. श्रेणियों में व्याख्यान देता रहा और इस विषय का विस्तृत अध्ययन कर पाया।

पूर्वलिखित पक्तियाँ, रविवार 9.10.55 को लिखी गई थीं। उस समय इस ग्रन्थ का संक्षिप्त पूर्व रूप प्रकाशित होने वाला था, पर कारण विशेष से वह प्रकाशित नहीं हुआ। अब श्री गोविन्दराम हासानन्द दूकान के स्वामी श्री विजयकुमार जी ने मुझे बाध्य किया कि मैं इसे प्रकाशित कराऊँ। मैंने कहा कि ग्रन्थ का परिमार्जन और परिवर्धन आवश्यक हो गया है। उन्होंने यह स्वीकार कर लिया। तद्नुसार ग्रन्थ का पर्याप्त भाग दोबारा लिखा गया और कई नए अध्याय : जोड़े गए।

इस ग्रन्थ के प्रकाशन में आर्य संस्कृति के अनन्य उपासक पूज्य श्री नारायण स्वामी जी का महान् योगदान है। उनका सतत प्रोत्साहन और स्वच्छ स्नेह मेरा मार्ग विस्तृत करता है। गत दो वर्ष में यह तीसरा ग्रन्थ है, जिसमें उनका सहयोग प्राप्त हुआ है।

डालमिया दादरी सीमेंट के प्रमुख प्रबन्धक श्री राजेश्वर जी भी वैदिक विज्ञान के प्रति मेरा उत्साह बढ़ाते हैं इन सबका मैं आभारी हूँ।

यह ग्रन्थ भारत के प्रधानमन्त्री श्री लालबहादुर शास्त्री जी के शासनकाल में प्रकाशित हो रहा है। उनके नेतृत्व में अभी सात दिन हुए, जब भारत ने पाकिस्तान के छल, कपट के युद्ध के ऊपर एक महान विजय प्राप्त किया है। पर उस छल के घोर मेघ अभी छाए हुए हैं।

29-9-65

भगवद्दत्त

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Bhartiya Sanskriti Ka Itihas”

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