भगवान शिव की दृष्टि में धर्म Bhagwan Shiv ki Drishti men Dharma
₹250.00
- Author: Acharya Agnivrat Naishthik
- Language: Hindi
- Pages: 132
- Edition: 2022
- Cover: Paperback
- Weight: 170 Gms.
भगवान शिव की दृष्टि में धर्म (Bhagwan Shiv ki Drishti men Dharma)
सम्पादकीय
आज भारत में जिस महापुरुष की सर्वाधिक पूजा की जाती है, वे हैं- भगवान् महादेव शिव। एक ओर जहाँ पौराणिक विद्वानों ने महादेव शिव के चरित्र को अत्यन्त अश्लील, चमत्कारी और काल्पनिक रूप में प्रस्तुत किया है, वहीं दूसरी ओर आर्यसमाजियों ने उनके चरित्र को हेय समझकर उपेक्षित कर दिया है। वस्तुतः दोनों ही उनके यथार्थ स्वरूप को समाज के सम्मुख प्रस्तुत नहीं कर पाए हैं।
सम्भवतः वे उन्हें, उनके चरित्र को, उनके आदर्शों एवं सिद्धान्तों को जानते ही नहीं हैं। ऐसी स्थिति में पूज्य आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक ने भगवान् महादेव के वास्तविक स्वरूप का बोध कराने के लिए महाभारत ग्रन्थ के आधार पर उनके धर्मविषयक उपदेशों को संसार के सामने प्रस्तुत किया। इस विषय पर आचार्यश्री के प्रवचनों का प्रसारण हमारे यूट्यूब चैनल ‘वैदिक फिजिक्स’ पर सोलह वीडियो के माध्यम से किया गया। ये प्रवचन महाभारत के अनुशासन पर्व के अन्तर्गत दानधर्म पर्व के एक श्लोक पर आधारित हैं। इनमें अहिंसा, सत्य, दया, शम और दान की प्रमाणपूर्वक व दृष्टान्तसहित व्याख्या की गई है।
ये प्रवचन प्रत्येक मनुष्य को सुनने व ग्रहण करने चाहिए और सुनकर व्यवहार में भी लाने चाहिए, विशेषकर गृहस्थियों को। महाभारत में आया है-
‘श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।’
अर्थात् धर्म का सर्वस्व क्या है? सुनो और सुनकर उस पर चलो।
धर्म की अनिवार्यता को बतलाते हुए, महर्षि वेदव्यास महाभारत के स्वर्गारोहण पर्व में कहते हैं-
ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे। धर्मादर्थश्च कामश्च सः किमर्थं न सेव्यते ॥
अर्थात् मैं दोनों भुजाएँ ऊपर उठा कर, पुकार-पुकार कर कह रहा हूँ, किन्तु मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्म से मोक्ष तो मिलता ही है, अर्थ और काम भी धर्म से ही से सिद्ध होते हैं, फिर भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते ? आचार्य चाणक्य धर्म को सुख का मूल बताते हैं- ‘सुखस्य मूलं धर्मः।’ इसलिए प्रत्येक सुखाभिलाषी व्यक्ति को धर्म का आचरण अवश्य ही करना चाहिए।
इस पुस्तक में सर्वप्रथम धर्म के पहले लक्षण ‘अहिंसा’ पर विचार किया गया है। हिंसा, काम, क्रोध, लोभ आदि की तरंगें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को कैसे प्रभावित करती हैं? यह विज्ञान पाठकों के लिए नवीन होगा। इसके पश्चात् ‘सत्य’ की चर्चा की गई है, जिस पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड टिका हुआ है।
दया से ब्रह्माण्ड में संतुलन कैसे होता है? आगे इस विषय में विस्तार से बताया गया है। अगले कुछ अध्यायों में मनुष्य का मन व इन्द्रियाँ कैसे प्रदूषित हो रही है और इन्हें नियन्त्रित करके कैसे ब्रह्मचर्य का पालन किया जाए, बताया गया है। अन्त के दो अध्याय में दान क्यों करें ? और सर्वश्रेष्ठ दान क्या है? जैसे प्रश्नों के उत्तर पाठकों को पढ़ने को मिलेंगे। पुस्तक के अन्त में परिशिष्ट के रूप में भगवान् शिव के अनुसार चारों वर्णों के धर्म, वर्ण परिवर्तन और स्वर्ग का अधिकारी कौन ? ये विषय वर्णित हैं।
पाठकों की सुविधा और कुछ सज्जनों के आग्रह पर हमने इन प्रवचनों को लिपिबद्ध करने का निर्णय लिया। आचार्यश्री के उपदेशों को लिखित रूप देने का श्रेय प्रिय यशपाल आर्य को जाता है। मौखिक और लिखित भाषा में अन्तर होने के कारण इनकी भाषा को परिष्कृत करना अत्यावश्यक था। इस कार्य को मेरी सहधर्मिणी श्रीमती मधुलिका आर्या, जो श्रीमद् दयानन्द कन्या गुरुकुल, चोटीपुरा की सुयोग्य स्नातिका हैं तथा सम्प्रति जिनकी पीएच.डी. पूर्णता की ओर है, ने कुशलतापूर्वक सम्पादित किया, इसके लिए उनका हृदय से धन्यवाद।
पाठकों से विनम्र निवेदन है कि वे पुस्तक को आद्योपान्त पढ़ें, साथ ही वे इन विषयों पर गम्भीरतापूर्वक चिन्तन करें और इन उपदेशों को अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न करें, जिससे उनका जीवन सुखमय और आदर्श बन सके।
– विशाल आर्य
भूमिका
भगवान् महादेव शिव एक ऐतिहासिक महापुरुष थे, जो देव वर्ग में उत्पन्न हुए थे। कैलाश क्षेत्र इनकी राजधानी थी। श्रावणमास के आरम्भ से ही देश व विदेश के शिवालयों में पूजा, कीर्तन, कथाएँ, शिवलिंग की अश्लील पूजा, जो शिवपुराण में वर्णित दारुवन कथा पर आधारित है तथा इस कथा को कोई सभ्य व सुसंस्कृत महिला वा पुरुष सुन भी नहीं सकते हैं, प्रारम्भ हो जाती है।
शिवलिंग पर दूध चढ़ाना, जो बहकर नालियों में जाकर पर्यावरण को प्रदूषित करता है, क्या यही सच्ची पूजा का स्वरूप है? आश्चर्य है कि भगवान् शिव के इस अभागे राष्ट्र में जहाँ करोड़ों बच्चे वा बूढ़े भरपेट रोटी के लिए तड़पते हों, उस देश में इस प्रकार से दूध बहाना, क्या उन भूखे नर-नारियों के साथ स्वयं भगवान् शिव का भी अपमान नहीं है? कितने शिवभक्त भगवान् शिव के विमल व दिव्य चरित्र, शौर्य, ईश्वरभक्ति, योगसाधना एवं अद्भुत ज्ञान-विज्ञान से परिचित हैं, यह आप स्वयं आत्मनिरीक्षण करें।
भगवान् शिव कैसे थे, उनकी क्या प्रतिभा थी, उनके क्या उपदेश थे, यह जानने-समझने का न तो किसी के पास अवकाश है और न समझ। इस कारण हम एक श्रृंखला के रूप में उनके गम्भीर उपदेशों व ज्ञान-विज्ञान को महाभारत ग्रन्थ के आधार पर प्रस्तुत करना प्रारम्भ कर रहे हैं। यह वर्णन भीष्म पितामह के उन उपदेशों में मिलता है, जो उन्होंने शर-शय्या पर धर्मराज युधिष्ठिर को दिए थे।
आज यह बड़ी विडम्बना है कि पौराणिक (कथित सनातनी) भाइयों ने भगवत्पाद महादेव शिव को अत्यन्त अश्लील, चमत्कारी व काल्पनिक रूप में चित्रित किया है, जबकि आर्यसमाजी बन्धुओं ने मानो उन्हें कचरे पात्र में फेंक दिया है। ऐसे में उनका यथार्थ चित्रण संसार के सम्मुख नितान्त ओझल हो गया है।
पौराणिक बन्धु धर्म के नाम से प्रचलित विभिन्न मान्यताओं व कथाओं को बुद्धि के नेत्र बन्द करके अक्षरशः सत्य मान लेते हैं और कोई मिथ्या बातों का खण्डन करे, तो उसे हिन्दूविरोधी कहकर झगड़ने को उद्यत रहते हैं। वे यह भी नहीं सोचते कि मिथ्या कथाओं व अन्धविश्वासों के कारण ही इस भारत और हिन्दू जाति की यह दुर्गति हुई है, भारत का इतिहास और ज्ञान-विज्ञान नष्ट हुआ है, भारत सैकड़ों वर्षों तक विदेशियों का दास रहा है।
उधर आर्यसमाजी बन्धु गम्भीर चिन्तन व स्वाध्याय के बिना पुराणों के साथ-साथ महाभारत, वाल्मीकि रामायण की भी सभी अथवा अधिकांश बातों को गप्पें मानकर खण्डन करने में तत्पर रहते हैं, भले ही उन्हें महादेव, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र जैसे भगवन्तों को ही भूलने का पाप क्यों न करना पड़े, वे खण्डन करने को ही आर्यत्व समझ लेते हैं। वे नहीं सोचते कि यदि मिथ्या कथाओं का खण्डन करना है, तो इन देवों के सत्य इतिहास तो जानना व जनाया जाना अनिवार्य है।
आपसे आग्रह है कि आप इन उपदेशों को गम्भीरतापूर्वक सुने, विचारें तथा आचरण में लाकर वास्तविक शिवभक्त बनने का प्रयास करें। ईश्वर हम सबको ऐसा सच्चा शिवभक्त बनने की बुद्धि व शक्ति प्रदान करें, यही कामना है।
भगवान् शिव के विषय में प्रायः शिवपुराण की कथा का वाचन होता है, जबकि महर्षि वेदव्यास कृत महाभारत को पढ़ने वाले अब रहे ही नहीं। उल्लेखनीय है कि महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित समझे जाने वाले अठारह पुराण वास्तव में उनके द्वारा नहीं, बल्कि अन्य आचार्यों द्वारा रचे गए थे और ये ग्रन्थ प्रामाणिक ग्रन्थों की कोटि में नहीं हैं।
यद्यपि महाभारत में भी लगभग 95 प्रतिशत भाग ऐसा है, जो महर्षि वेदव्यास के पश्चात् उनके शिष्यों एवं कालान्तर के अनेक अप्रामाणिक विद्वानों ने लिखकर जोड़ दिया है। पुनरपि ‘महाभारत’ अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। महर्षि दयानन्द कृत ‘सत्यार्थप्रकाश’ एवं ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ के गम्भीर अध्ययन से प्राप्त प्रखर व नीर-क्षीर विवेकी प्रज्ञा के द्वारा हम किसी भी आर्षग्रन्थ को अच्छी प्रकार से समझ सकते हैं। मेरा ‘वेदविज्ञान-आलोक’ ग्रन्थ भी इस प्रकार के अन्वेषण में परोक्ष सहयोग कर सकता है।
अब हम महादेव भगवान् शिव की चर्चा करते हैं-
महर्षि दयानन्द ने अपने पूना प्रवचन में महादेव शिव को अग्निष्वात का पुत्र कहा है। अग्निष्वात किसके पुत्र थे, यह बहुत स्पष्ट नहीं है, परन्तु वे महर्षि ब्रह्मा के वंशज अवश्य थे। महाभारत में महर्षि वैशम्पायन ने कहा है-
उमापतिर्भूतपतिः श्रीकण्ठो ब्रह्मणः सुतः ।।
उक्तवानिदमव्यग्रो ज्ञानं पाशुपतं शिवः ॥
शान्तिपर्व। मोक्षधर्मपर्व। अध्याय 349। श्लोक 67 (गीता प्रेस)
यहाँ भगवती उमा के पति भूतपति, जो महादेव भगवान् शिव का ही नाम है, को महर्षि ब्रह्मा का पुत्र कहा है। इनका पाशुपत अस्त्र विश्वप्रसिद्ध था। इस अस्त्र को नष्ट करने वाला कोई अस्त्र भूमण्डल पर नहीं था।
महाभारत के अनुशीलन से भगवान् शिव अत्यन्त विरक्त पुरुष, सदैव योगसाधना में लीन, विवाहित होकर भी पूर्ण जितेन्द्रिय, आकाशगमन आदि अनेकों महत्त्वपूर्ण सिद्धियों से सम्पन्न, वेद वेदांगों के महान् वैज्ञानिक, सुगठित, तेजस्वी व अत्यन्त बलिष्ठ शरीर वाले व वीरता के अप्रतिम धनी दिव्य पुरुष थे। वे जीवन्मुक्त अवस्था को प्राप्त महाविभूति थे। उनके इतिहास का वर्णन तो अधिक नहीं मिलता, परन्तु उनके उपदेशों को हम महाभारत में पढ़ सकते हैं। इस कारण हम इस ग्रन्थ पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे।
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