श्रुति सौरभ
Shruti Saurabh

250.00

Book Details:
  • Author: Pt. Shivkumar shastri
  • Language: Hindi
  • Pages: 424
  • Edition: 2022
  • Cover: Hard Cover
  • ISBN: 9788170770961
  • Weight: 590 Gms.
Description

दो शब्द

श्री पं० शिवकुमार जी शास्त्री आर्यसमाज की स्पृहणीय विमल विभूति हैं। उनके व्यक्तित्व में इतने गुणों का समावेश है कि उनके सम्पर्क में आनेवाला कोई भी व्यक्ति उनका प्रशंसक बने बिना नहीं रह सकता। शास्त्री जी ने ‘सत्यं ब्रूयात्’ और ‘प्रियं ब्रूयात्’ का अपने जीवन में ऐसा समन्वय किया है कि आजकल के असूया-प्रवण समाज में भी वे ‘अजातशत्रु’ ही दिखाई देते हैं।

शास्त्री जी संसत्सदस्य के रूप में राजनीति में भी रहे, पर नीति-विहीन राजनीति कभी उनको रास नहीं आई और वे सदा ‘पद्मपत्रमिवाम्भसा’ राजनीति के पङ्क से अलिप्त ही रहे। कितनी ही सरकारी समितियों के सदस्य रहे, आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तरप्रदेश के प्रधान रहे, गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर के आचार्य और मुख्याधिष्ठाता रहे तथा अन्य अनेक उच्च पदों पर रहे, पर सत्ता के मद या मोह ने कभी उनका स्पर्श नहीं किया।

औदार्य, सहृदयता, अनुशासनप्रियता, व्यवहार की शुचिता और आपादमस्तक सौजन्य की प्रतिमूर्त्ति शास्त्री जी के जीवन का अधिकांश भाग आर्यसमाज के उपदेशक के रूप में व्यतीत हुआ है। आदर्श उपदेशक के सब गुण उनमें विद्यमान हैं। विद्वत्ता और वाग्मिता का उनमें अद्भुत समन्वय है। यही कारण है कि सुवक्ता और सर्वोत्तम उपदेशक के रूप में उनकी ख्याति अद्यावधि किंचित् भी न्यून नहीं हुई। उनके भाषण ‘अखबारी’ नहीं होते, उनमें लफ्फ़ाज़ी या भाषा का आडम्बर भी नहीं होता, पर विषय की गम्भीरता, तर्कशुद्धता तथा सिद्धान्तप्रियता के साथ-साथ उसमें साहित्य-रस इतना अधिक होता है कि हज़ारों की संख्या में श्रोता मन्त्रमुग्ध होकर सुनते हैं।

चिरकाल से शास्त्री जी अपने भाषणों के आवश्यक अंश अङ्कित करते रहे हैं। यह बहुत अच्छी आदत है। जो ऐसा नहीं करते, वे कदाचित् आवश्यकता से अधिक आत्मविश्वास के वशीभूत होते हैं। पर ऐसा आत्मविश्वास सदा काम नहीं आता, यह भुक्तभोगी लोग जानते हैं।

शास्त्री जी ने वेद-मन्त्रों की व्याख्या के रूप में अपने कुछ भाषणों को इस पुस्तक में सङ्कलित करके अपनी समकालीन वर्तमान पीढ़ी और आगामी पीढ़ी पर जो उपकार किया है, उसे पुस्तक को पढ़नेवाले ही जान सकेंगे। प्रारम्भ में वेद-मन्त्र देकर उसका अन्वय, फिर शब्दार्थ, फिर मन्त्र में कही गई मुख्य बातों का वर्गीकरण करके एक-एक की क्रमशः व्याख्या- इसी शैली को शास्त्री जी व्याख्याता के रूप में भी अपनाते हैं। इस शैली में जहाँ विषय अत्यन्त सरल हो जाता है, वहाँ श्रोता (और यहाँ पाठक) के सामने मन्त्र का पूरा अर्थ इस प्रकार उद्भासित हो जाता है कि फिर वह उसे नहीं भूल सकता।

इस व्याख्या में ही लेखक की विद्वत्ता, बहुज्ञता, शास्त्र-परायणता और सुलझे हुए विचारों की ऐसी अटूट श्रृङ्खला मिलती है कि पाठक भावविभोर हो जाता है। वेद मन्त्र की व्याख्या भी इतनी सरस हो सकती है, यह देखकर आश्चर्य होता है। विशेषता यह है कि इस व्याख्या में कहीं स्तर-हीनता नहीं, केवल मनोरञ्जन के लिए कहीं चुटकुलेबाज़ी नहीं, कहीं काल्पनिक कथाओं का आश्रय नहीं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि हम किसी वेद-मन्त्र की व्याख्या नहीं, प्रत्युत साहित्य के रस से सराबोर कोई सरस निबन्ध पढ़ रहे हैं।

शास्त्री जी संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित हैं। संस्कृत के पण्डितों से शे’रो-शायरी की आशा नहीं की जाती। पर संस्कृत के काव्यों के उद्धरणों के साथ-साथ उर्दू के शे’र स्थान-स्थान पर ऐसे फ़िट होते हैं कि पाठक या श्रोता बिना वाह-वाह किये नहीं रह सकते।

लेखक ने कहीं-कहीं प्रसङ्ग के अनुरूप, वाल्मीकि रामायण और महाभारत में से ऐसे अछूते सन्दर्भ निकालकर रखे हैं, जिनसे प्रायः विद्वान् लोग भी अपरिचित हैं। उदाहरण के लिए, दूसरे ही मन्त्र की व्याख्या में, लेखक ने संसार में सर्वथा बदनाम दुर्योधन और कर्ण के जिन गुणों का सप्रमाण वर्णन किया है, उनसे सुधीजन भी अल्प परिचित ही होंगे। योगेश्वर कृष्ण महारथी कर्ण के पास जाकर कहते हैं (संस्कृत के श्लोक जान-बूझकर छोड़ रहे हैं)-

“हे कर्ण! तू वेद और शास्त्रों को जानता है। धर्मशास्त्रों में तेरी अच्छी गति है। तू धर्मानुसार पाण्डु का ही पुत्र है, इसलिए धर्मशास्त्र की मर्यादा के अनुसार तुझे दुर्योधन को छोड़कर पाण्डवों का ही साथ देना चाहिए। युधिष्ठिर आदि पाँचों तेरे भाई हैं।

तेरी ननिहाल में हम वृष्णि और अन्धक कुल के लोग हैं। इन दोनों पक्षों के महत्त्व को समझ ले। जब तू मेरे साथ पाण्डव-पक्ष में जाएगा, तो युधिष्ठिर तुझे बड़े भाई के रूप में पहचानेंगे। पाँचों पाण्डव तुझसे छोटे होने के कार अपने बड़े भाई के चरण छुएँगे, द्रौपदी के पुत्र और अभिमन्यु तेरे चरणों में मस्तक नवाएँगे। पाण्डव-पक्ष में एकत्र हुए अन्य सब लोग तेरे वशंवद होंगे। मैं स्वयं राजा के रूप में तेरा अभिषेक करूँगा। धर्मराज युधिष्ठिर तेरे पीछे श्वेत व्यजन लेकर खड़ा होगा। गदाधारी भीम चैंवर डुलाएगा।

गाण्डीवधारी अर्जुन सफेद घोड़ोंवाले तेरे रथ को हाँकेगा। नकुल, सहदेव, अभिमन्यु, पाञ्चाल आदि सब, और मैं भी, तेरे पीछे-पीछे चलेंगे। तू पाँचों पाण्डवों के बीच में ऐसे ही शोभित होगा जैसे नक्षत्रों के बीच में चन्द्रमा।”

इसके उत्तर में कर्ण ने कहा-

“हे केशव ! निस्सन्देह स्नेह और सौहार्द के वशीभूत होकर मेरे कल्याण की कामना से ही आपने ये बातें कही हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि धर्मशास्त्र की मर्यादा के अनुसार मैं पाण्डु का ही पुत्र हूँ, किन्तु जब पैदा होते ही कुन्ती ने लोक-लाजवश मुझे त्याग दिया था, तब अधिरथ सूत मुझे उठाकर लाए थे और उनकी पत्नी राधा ने अपना दूध पिलाकर मुझे पाला था और मेरा मल-मूत्र साफ किया था।

मैं उस राधा के उपकार को कैसे भूल सकता हूँ? जिस अधिरथ ने शास्त्रों के अनुसार मेरे समस्त संस्कार करवाए हैं और जिसे मैं अपना पिता मानता हूँ, जिसने युवा होने पर मेरा विवाह करवाया और अब मेरे पुत्र और पौत्र हैं, जिनसे मैं आत्मीयता के सूत्र में बँधा हूँ, हे कृष्ण ! समस्त पृथिवी के शासन और अपार सोने के भण्डार से भी मैं इन सम्बन्धों को नहीं झुठला सकता।

इसके अतिरिक्त, हे कृष्ण ! जिस दुर्योधन के कारण मैंने १३ वर्ष तक निष्कंटक राज्य-सुख भोगा है और जिस दुर्योधन ने मेरे ही भरोसे पर पाण्डवों से यह युद्ध रोपा है और अर्जुन से लोहा लेने के लिए मुझे चुना है, मैं मृत्यु भय से या किसी भी प्रलोभन के कारण उस दुर्योधन के साथ विश्वासघात करने को तैयार नहीं हूँ। इसलिए हे जानार्दन ! मेरे इस जन्म के रहस्य को और पाण्डवों का बड़ा भाई होने के भेद को आप अपने तक ही गुप्त रखें।

इसी में सबका भला है। यदि धर्मात्मा युधिष्ठिर को पता लगेगा कि मैं कुन्ती का ज्येष्ठ पुत्र हूँ, तो वह राज्य लेना स्वीकार नहीं करेगा और राज्य मुझे सौंप देगा। युधिष्ठिर द्वारा दिये गए राज्य को दुर्योधन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मैं दुर्योधन को दे दूँगा। तब महाभारत का यह सारा युद्ध ही व्यर्थ हो जाएगा। इसलिए मेरी कामना यही है कि जिसका नेता कृष्ण है और योद्धा अर्जुन है, वह राजा युधिष्ठिर ही सदा राजा बना रहे।”

कर्ण के लोकोत्तर चरित्र की यह कैसी मनोरम झाँकी ! अब ज़रा दुर्योधन के चरित्र की भी एक झाँकी देखिये –

कर्ण के सेनापति बनने पर अश्वत्थामा ने यह प्रतिज्ञा की थी कि वह उसके सेनापतित्व में शस्त्र नहीं उठाएगा। जब युद्ध में अर्जुन ने कर्ण को समाप्त कर दिया, तब अश्वत्थामा हर्ष-विभोर हो दुर्योधन के पास पहुँचा और बोला- “राजन् ! जिस कर्ण पर तुमने पाण्डवों को परास्त करने की आशा बाँध रखी थी, वह उनका बाल भी बाँका नहीं कर सका। अब तुम मेरा जौहर देखना ! मैं एक दिन में ही ‘निष्पाण्डवा मेदिनी’- इस धरती से पाण्डवों को समाप्त कर दूँगा।”

जहाँ तक राजनीति का सम्बन्ध है, दुर्योधन को अश्वत्थामा की इस बात को परखना और उसका लाभ उठाना चाहिए था। पर दुर्योधन की नैतिकता देखिये। उसने कहा- “गुरु-पुत्र ! पहले तुमने यह प्रतिज्ञा की थी कि जब तक कर्ण जीवित है, तब तक शस्त्र नहीं उठाऊँगा। अब तुम यह प्रतिज्ञा और कर लो कि जब तक दुर्योधन नहीं मर जाता, तब तक शस्त्र नहीं उठाऊँगा।

मेरी दृष्टि में तुम और अर्जुन दोनों एक-समान हो। एक ने मेरे मित्र कर्ण का भौतिक शरीर समाप्त किया है और तुम उसके मरने पर कटु वचन कहकर उसके यशः रूपी शरीर को नष्ट कर रहे हो। जैसे मैं अपने मित्र के शत्रु अर्जुन द्वारा दी हुई राज्य-लक्ष्मी को स्वीकार नहीं कर सकता, वैसे ही तुम्हारे शौर्य से लाभ उठाना भी मैं नीच-कर्म समझता हूँ।” आज के राजनीतिज्ञ ऐसी नैतिकता की बात स्वप्न में भी नहीं सोच सकते।

इसी प्रकार जब भीम ने दुर्योधन से युद्ध करते हुए, युद्ध के नियमों के विपरीत कमर के नीचे वार करके उसकी जाँघे चूर-चूर कर दीं, तब बलराम ने क्रुद्ध होकर कहा- “अब इस अनर्थकारी भीम का वध मैं करूँगा!” तब अर्धमृत अवस्था में केवल अपनी भुजाओं के सहारे किसी प्रकार भूमि पर घिसटते हुए दुर्योधन ने कहा- “हे बलराम ! अब आप ऐसा करके पाण्डवों के रङ्ग में भङ्ग मत डालिये ! कुरुकुल के दावानल को समाप्त करनेवाला पाण्डव-कुल का एक मेघ सही-सलामत रहे ! अब तो वैर और विग्रह की जड़ मैं और मेरे सब साथी समाप्त हो गए।

यदि मुझपर भीम के प्रहार को आप नियमविरुद्ध समझते हैं, तो मेरी वीरता के लिए आपका इतना प्रमाणपत्र ही काफी है कि छल से हराकर भी भीम मुझे जीत नहीं सका।”

जब दुर्योधन के क्षत-विक्षत होने का समाचार सुनकर उसकी पत्नी भानुमती आई और अपने पति की मरण-वेला निकट जानकर करुण विलाप करने लगी, तब दुर्योधन की वीरवाणी सुनिये –

“भीम के गदा-प्रहारों से मेरी भौंहें विदीर्ण हो गई हैं। छाती पर इतने प्रहार लगे हैं कि अब मुझे हीरे-मोतियों के हारों की भी आवश्यकता नहीं रही। दोनों भुजाएँ भी स्थान-स्थान पर घावों के कारण सोने के बाजूबन्दों से भी अधिक शोभित हो रही हैं। हे क्षत्राणी! तेरा पति युद्ध में पीठ दिखाकर नहीं मर रहा है, फिर तू रोती क्यों है ? रोने की बात तो तब होती, जब मैंने युद्ध में पीठ दिखाई होती!”

कर्ण और दुर्योधन के चरित्र पर यह सर्वथा नया प्रकाश है और इस बात का प्रतीक है कि पतित-से-पतित व्यक्ति में भी कुछ ऐसे गुण छिपे होते हैं, जो प्रायः दुनिया की आँखों से ओझल रहते हैं।

‘जैसा करोगे, वैसा भरोगे’ शीर्षक चौथे लेख में शास्त्री जी ने भर्तृहरि का एक श्लोक उद्धृत किया है-

गन्धं सुवर्णे फलमिक्षुदण्डे, नाकारि पुष्पं खलु चन्दनस्य। विद्वान् धनी भूपतिर् दीर्घजीवी, धातुः पुरा कोऽपि न बुद्धिदोऽभूत् ॥

कोई नास्तिक परमात्मा पर आक्षेप करता हुआ कहता है- ‘सोने में सुगन्ध नहीं, ईख पर फल नहीं, चन्दन के पेड़ पर फूल नहीं, विद्वान् धनी नहीं, राजा दीर्घजीवी नहीं, यह परमात्मा का कैसा बुद्धिहीन विधान है! क्या उसे अक्ल सिखानेवाला कोई नहीं मिला?’

इन आरोपों का जैसा युक्तियुक्त उत्तर इस लेख में दिया गया है, उसे पढ़कर बड़े-से-बड़ा नास्तिक भी परमात्मा की बुद्धिमत्ता का कायल हुए बिना नहीं रह सकता।

सातवें लेख का शीर्षक है- ‘ईश्वरीय ज्ञान वेद और उसका स्वरूप’। इस लेख में मानवीय भाषा की और ज्ञान की उत्पत्ति कैसे होती है, इस पर वैज्ञानिकों के उद्धरणों से विषय पर सर्वथा नए ढङ्ग से प्रकाश डाला गया है। सभ्यता के विकास के इतिहास का पर्यालोचन करते हुए लेखक ने पते की बात कही है। युरोप में सभ्यता का विकास रोम के सम्पर्क से हुआ। यूनान में सभ्यता का नवोन्मेष मिश्र के सम्पर्क से हुआ।

मिश्र को सभ्यता का पाठ भारत ने पढ़ाया। इस प्रकार सारे संसार के ज्ञान-विज्ञान के विकास का मूल खोजते-खोजते हम भारत, अर्थात् आर्यावर्त तक पहुँच जाते हैं। अब मूल प्रश्न यह रह गया कि भारत में ज्ञान-विज्ञान का मूल आधार क्या है? निस्सन्देह इस प्रश्न का केवल एक ही उत्तर हो सकता है और वह उत्तर यह है कि भारत के ऋषि-महर्षियों ने परम गुरु परमात्मा से ज्ञान प्राप्त करके अपनी वाणी से उसका प्रचार और प्रसार किया।

धीरे-धीरे सारे संसार में सभ्यता और संस्कृति का वही उच्चतम कीर्तिमान बन गया। इस लेख में विकासवाद के प्रचलित सिद्धान्तों का जिस युक्तियुक्त ढङ्ग से खण्डन किया गया है, वह लेखक के गहन अध्ययन का परिचायक है। अन्त में सिसरो का यह उद्धरण भी स्मरणीय है- “प्रकृति ने हमें ज्ञान के केवल छोटे-छोटे दीपक प्रदान किये हैं, पर उन्हें भी हम अपनी अनैतिकताओं, भ्रष्ट आचरणों और भूलों से बुझा देते हैं। उसका परिणाम यह होता है कि प्रकृति का वह आलोक कहीं भी अपनी पूर्ण दीप्ति और पवित्रता में प्रकाशित नहीं हो पाता।”

हमने केवल बानगी के तौर पर कुछ लेखों की कुछ विशेषताओं की ओर सङ्केत किया है। इसी प्रकार प्रत्येक लेख में कोई-न-कोई ऐसी विशेषता है, जिसके कारण वह सामान्य न रहकर असामान्य बन जाता है। सभी लेखों में से इस प्रकार के उदाहरण दिये जा सकते हैं, परन्तु तब सारी पुस्तक ही उद्धृत करनी पड़ेगी।

जिस तरह आचार्य विष्णु शर्मा ने पञ्चतन्त्र में वर्णित पशु-पक्षियों की कथाओं द्वारा राजपुत्रों को राजनीति में निपुण बना दिया था, उसी प्रकार इन लेखों से सामान्य व्यक्ति भी अच्छा पण्डित, व्याख्याता और उपदेशक बन सकता है। यह पुस्तक गुरुकुलों, उपदेशक-विद्यालयों तथा अन्य आर्य शिक्षण संस्थाओं में पाठ्य-पुस्तक के रूप में निर्धारित हो सके, तो जहाँ छात्रों को वेद-मन्त्रों का सही अर्थ, उनका महत्त्व और आर्य-सिद्धान्तों का परिचय प्राप्त होगा, वहाँ उनके लिए ज्ञानवर्द्धन भी कम नहीं होगा। सामान्य पाठक को तो साहित्य-रस के आस्वादन के लिए ही इन लेखों को बार-बार पढ़ने की इच्छा होगी।

छपने से पहले मेरे आदरास्पद अग्रज-बन्धु ने इस पुस्तक के सम्बन्ध में मुझे दो शब्द लिखने का अवसर देकर जो गौरव प्रदान किया है, वह उनके स्नेहाधिक्य का ही परिणाम है। अन्यथा पुस्तक का प्रत्येक लेख स्वयं बोलता है, अपना परिचय आप देता है। इन लेखों को पढ़कर मुझे जो हार्दिक आनन्द की अनुभूति हुई है, वही आनन्द अन्य पाठकों को भी प्राप्त हो, यही कामना करता हूँ।

क्षितीश वेदालङ्कार
(सम्पादक ‘आर्यजगत्’)

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