उपनिषदों की व्याख्या (ईश, केन, कठ और प्रश्न) | Upanishadon ki Vyakhya (Isha, Kena, Katha, and Prashna)

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Book Details:
  • Author: Pro. Gyan Prakash
  • Language: Hindi, Sanskrit-Hindi
  • Publication: Parimal Publication
  • Pages: 518
  • Edition: 2026
  • Cover: Hard Cover
  • ISBN: 9788171109418
  • Weight: 1205 Gms.
Description

भारतीय संस्कृति का मूलाधार वेद हैं और वेदों का हृदय उपनिषद् हैं। उपनिषदों में मानव जीवन की शाश्वत जिज्ञासुओं का समाधान, आत्मा और ब्रह्म के सम्बन्ध का उद्घाटन तथा जीवन के परम लक्ष्य की दिशा का निर्देश मिलता है। यही कारण है कि उपनिषदों को वेदान्त कहा गया है- वेद का अन्तिम और सर्वोच्च तत्त्वज्ञान।

इस ग्रन्थ में ईश, केन, कठ और प्रश्न उपनिषदों की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है। ये चारों उपनिषद् अपने-अपने स्वरूप में अद्वितीय हैं, किन्तु उनका लक्ष्य एक ही है- मानव को आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान की ओर ले जाना।

ईशोपनिषद् में जीवन के समग्र दर्शन का उद्घाटन है। इसमें त्याग और भोग का अद्भुत समन्वय है। केनोपनिषद् में ज्ञान और इन्द्रियबुद्धि की सीमा का विवेचन है। कठोपनिषद् में नचिकेता और यमराज का संवाद है, जो मृत्यु और अमृतत्व के रहस्य को उद्घाटित करता है। प्रश्नोपनिषद् में छह प्रश्नों के माध्यम से सृष्टि, प्राण, ध्यान और आत्मा के रहस्य का क्रमबद्ध विवेचन है।

इस ग्रन्थ की विशेषता यह है कि इसमें परम्परागत भाष्यों का सम्मान करते हुए आधुनिक दृष्टि से भी उपनिषदों की व्याख्या की गई है। कहीं-कहीं असंगतियों की समीक्षा भी की गई है, ताकि पाठक केवल शाब्दिक अर्थ तक सीमित न रहें, बल्कि उपनिषदों के गूढ़संदेश को समझ सकें।

अतः यह ग्रन्थ केवल विद्वानों के लिए ही नहीं, अपितु सामान्य पाठकों के लिए भी उतना ही उपयोगी है। यह उन्हें उपनिषदों के निकट लाता है और जीवन को आत्मज्ञान की ओर उन्मुख करता है।

प्रस्तावना

भारतीय संस्कृति का मूलाधार वेद हैं और वेदों का हृदय उपनिषद् हैं। उपनिषदों में मानव जीवन की शाश्वत जिज्ञासाओं का समाधान, आत्मा और ब्रह्म के सम्बन्ध का उद्घाटन तथा जीवन के परम लक्ष्य की दिशा का निर्देश मिलता है। यही कारण है कि उपनिषदों को “वेदान्त” कहा गया है- वेद का अन्तिम और सर्वोच्च तत्त्वज्ञान।

इस ग्रन्थ में ईश, केन, कठ और प्रश्न उपनिषदों की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है। ये चारों उपनिषद् अपने-अपने स्वरूप में अद्वितीय हैं, किन्तु उनका लक्ष्य एक ही है- मानव को आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान की ओर ले जाना।

ईशोपनिषद् में जीवन के समग्र दर्शन का उद्घाटन है। इसमें त्याग और भोग का अद्भुत समन्वय है- ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः’। यह उपनिषद् सिखाता है कि संसार में रहते हुए भी मनुष्य आत्मा की पूर्णता का अनुभव कर सकता है।

केनोपनिषद् में ज्ञान और इन्द्रियबुद्धि की सीमा का विवेचन है। यह उपनिषद् बताता है कि परम सत्य केवल तर्क या इन्द्रियज्ञान से नहीं, बल्कि आत्मानुभूति से ही उपलब्ध होता है।

कठोपनिषद् में नचिकेता और यमराज का संवाद है, जो मृत्यु और अमृतत्व के रहस्य को उद्घाटित करता है। श्रेय और प्रेय के भेद का विवेचन करते हुए यह उपनिषद् जीवन की दिशा निर्धारित करता है।

प्रश्नोपनिषद् में छह प्रश्नों के माध्यम से सृष्टि, प्राण, ध्यान और आत्मा के रहस्य का क्रमबद्ध विवेचन है। यह उपनिषद् साधक को प्रश्नोत्तर की पद्धति से आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।

इन चार उपनिषदों की व्याख्या को एक साथ प्रस्तुत करना केवल शास्त्रीय अध्ययन ही नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन की समग्रता को सामने लाना है। प्रत्येक उपनिषद् का स्वर अलग है, परन्तु उनका संदेश एक ही है-आत्मा और ब्रह्म की एकता।

इस ग्रन्थ की विशेषता यह है कि इसमें परम्परागत भाष्यों का सम्मान करते हुए आधुनिक दृष्टि से भी उपनिषदों की व्याख्या की गई है। कहीं-कहीं असंगतियों की समीक्षा भी की गई है, ताकि पाठक केवल शाब्दिक अर्थ तक सीमित न रहें, बल्कि उपनिषदों के गूढ़ संदेश को समझ सकें।

आज के युग में जब जीवन की गति अत्यधिक भौतिकता की ओर बढ़ रही है, उपनिषदों का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। आत्मा की स्वतन्त्रता, ब्रह्म की पूर्णता और जीवन की शाश्वत दिशा- ये सब उपनिषदों के माध्यम से ही स्पष्ट होते हैं।

अतः यह ग्रन्थ केवल विद्वानों के लिए ही नहीं, बल्कि सामान्य पाठक के लिए भी उपयोगी है। यह उन्हें उपनिषदों के निकट लाता है और जीवन को आत्मज्ञान की ओर उन्मुख करता है।

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