पाकिस्तान का विष वृक्ष | Pakistan Ka Vish Vriksh
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- Author: Rajarshi Parashar
- Language: Hindi
- Publication: Satya Dharma Prakashan
- Pages: 96
- Edition: 2011
- Cover: Paperback
- Weight: 130 Gms.
पाकिस्तान का विष वृक्ष (Pakistan Ka Vish Vriksh)
प्रकाशकीय
हिन्दुस्तान की दो भुजाओं के समान कट कर बना पाकिस्तान आज एक बीती बात हो चुकी है और ‘पूर्वी पाकिस्तान’ श्रीमती इंदिरा गांधी की बुद्धिमत्ता से अब पृथक् ‘बांगला देश’ बन चुका है। एक पाकिस्तान का नाम मिट चुका है।
किन्तु पाकिस्तान किन परिस्थितियों में बना, कौन उसके जिम्मेदार हैं, हिन्दुओं को को उन हालातों में क्या-क्या दुःख सहने पड़े, हिन्दुओं के दुःखों का कारण कौन थे, आदि बातों को ऐतिहासिक दृष्टि से जानना, पढ़ना, याद रखना बहुत जरूरी है। क्योंकि इतिहास के वास्तविक तथ्यों की जानकारी न होने से कोई भी जाति पुनः पुनः धोखा खा जाती है।
‘पाकिस्तान का विष-वृक्ष’ नामक पुस्तक के लेखक श्री श्याम जी पाराशर उस समय के उन राष्ट्रवादी लेखकों में से एक हैं जिन्होंने सारे दृश्यों को अपनी आंखों से देखा है, अपने कानों से सुना है, अपनी आत्मा से उस पीड़ा को अनुभव किया है। यही कारण है कि इनके द्वारा वर्णित सभी तथ्य यथार्थ हैं, घटनाएं वास्तविक हैं। हमारे हिन्दू भाई किस प्रकार उजड़े, किस प्रकार भूखे-प्यासे दिन बिताये, किस प्रकार सड़कों पर रुलते रहे, किस प्रकार उन्होंने मजबूर होकर अपनी आंखों के सामने अपनी बहू-बेटियों की इज्जत को लुटते देखा।
उनका ध्यान करके आज भी रोम-रोम कांपने लगता है। उस पर भी भारतीय के तत्कालीन नेता हिन्दुओं की उपेक्षा करते रहे और अत्याचारी मुसलमानों की तुष्टि में लगे रहे। लेखक का कहना है कि इस सारे पाप की जिम्मेदारी और भागीदारी तत्कालीन कांग्रेस रही है। कांग्रेस के उस पाप को आज की नयी पीढ़ियों ने भुला दिया है।
लेखक विचारधारा से कांग्रेसी थे, कांग्रेस के समर्थक थे, किन्तु कांग्रेस द्वारा हिन्दुत्व और हिन्दू समाज के साथ किये गये पक्षपात और अन्यायों से विक्षुब्ध रहे। मुसलमानों के लिए कांग्रेस द्वारा किये गये घोर तुष्टीकरण से लेखक बेहद खिन्न थे। यही क्षोभ और पक्षपात का कष्ट उनकी वाणी से उभरा है।
प्रत्येक देश के प्रबुद्ध नागरिकों को अपने देश के इतिहास और परिस्थितियों का ज्ञान होना चाहिए और अवश्य होना चाहिए। इसलिए इस पुस्तक का पुनः प्रकाशन किया गया है। पाठक इसको पढ़ें, इससे शिक्षा लें और अपने भविष्य को सुधारें।
– आचार्य सत्यानन्द ‘नैष्ठिक’
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